COVID-19 Vaccine Trial in Atmanirbhar Bharat-क्या सचमुच आत्मनिर्भर बन रहा है भारत
पिछले कुछ दिनों से आत्मनिभर भारत की बात चल रही है। निश्चित ही ये सराहनीय व अनुकरणीय पहल है.. यदि परिपूर्णता से पालन हो। पर विचारणीय यह है कि हम जब आत्मनिर्भरता की बात करते हैं तो क्या हम वास्तविकता में सही अर्थों में आत्मनिर्भर होने की ओर अग्रसर हैं या हो पाएंगे ??
हमारे राष्ट्राध्यक्ष ने जब भी कोई निर्णय लिया या किसी मुद्दे पर जनसमर्थन का आह्वान किया तो लगभग सारे देश ने एक स्वर में उनका साथ दिया। जब मैं कहता हूं लगभग तो इसका अर्थ है कि कभी भी किसी निर्णय में सारे देश की आबादी का समर्थन मिलना लोकतंत्र में प्रायः असम्भव होता है। कई राजनीतिक दल विभिन्न विचारधाराएं आदि कभी भी सम्पूर्ण समर्थन नहीं बनने देतीं। परंतु फिर भी देश की अधिकतर आबादी ने उनके हर निर्णय को उचित सम्मान दिया और भविष्य में भी देशहित में लिए गए उनके हर निर्णय का समुचित सम्मान होगा ये निश्चित है।
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Atmanirbhar Bharat : असमंजस में है केंद्र सरकार
परंतु जब आत्मनिर्भरता की बात होती है तो ऐसा प्रतीत होता है की आमजन से तो आत्मनिर्भरता की पूरी उम्मीद की जा रही है पर केंद्र स्वयं इस विषय में असमंजस में है। उदाहरण के तौर पर कोरोना महामारी की वैक्सीन के मामले में रूस व चीन ने अपने नागरिकों को स्वनिर्मित वैक्सीन देना शुरू भी की कर दिया है। ब्रिटेन से भी कारगर वैक्सीन के शीघ्र इस्तेमाल करने की आवाज उठ रही है। अब तो अमेरिका भी नवम्बर माह से वेक्सीन वितरण की योजना बना रहा है।
Atmanirbhar Bharat : WHO के प्रोटोकाल्स से धीमी हो रही है वैक्सीन के बनने गति
जबकि इन सारे मुद्दों पर WHO अपने प्रोटोकाल्स की दुहाई दे रहा है पर अब इनमें से कोई भी देश इस गैरज़िम्मेदार संस्थान की बातों को गंभीरता से लेने पक्ष में नही दिखता। जबकि ये वो देश हैं जहां महामारी या तो अपने चरम पर पहुंच चुकी है व उतार पर है अथवा लगभग नियंत्रित हो चुकी है। इसके विपरीत हमारे देश मे कोरोना उफान पर है। फिर भी हम पुरजोर आत्मनिर्भरता की बात करने के बावजूद वैक्सीन के लिए WHO के ऊपर निर्भर हैं, वो भी तब जब हमारा देश सारे विश्व में होनेवाले वैक्सीन निर्माण में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है।
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Atmanirbhar Bharat : क्या कोविड-19 वैक्सीन बनाने में पिछड़ रहा है देश ..?
हमारे देश मे विकसित कोवाक्सिन ह्यूमन ट्रायल के दूसरे दौर में होने के बाद भी दौड़ में पिछड़ती दिखाई देती है। क्यों..?? क्या इसलिए कि WHO जैसे लापरवाह व लालची संस्थान नहीं चाहते कि वैक्सीनेशन की प्रक्रिया में भारत भी आगे हो और हम इस विषय मे लगभग परनिर्भर हैं इसलिए हां में हां मिलाने या मौन धारण करने के अलावा कुछ विशेष नहीं कर पा रहे। ये कैसी आत्मनिर्भरता है जो आम जनमानस पर तो सूक्ष्मतम स्तर पर लागू होती है पर वृहद स्तर पर उसके समीकरण ही बदल जाते हैं ।
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🤔🤔..
देश के नीति नियंताओं से बेहतर कौन समझेगा की नेतृत्व सर्वाधिक प्रभावशाली तभी होता है जब नेता स्वयं उदाहरण प्रस्तुत कर करे या स्वयं उदाहरण बने। कोई भी सैद्धान्तिक निर्णय तभी सर्वाधिक सफल होता है जब प्रयोगिकता स्वयं प्रमाणित की जाए। विचार या सिद्धान्त तो कई आये पर स्थिरता के साथ टिके वही जो प्रायोगिक तौर पर स्वप्रमाणित हुए या किये गए। क्या देश उम्मीद रखें कि निकट भविष्य में कोरोना वैक्सीन के मामले देशवासियों को एक प्रमाणित सक्षम नेतृत्व का सजीव उदाहरण देखने को मिलेगा ?
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